Friday, March 23, 2012

~~~... khwaab, khayaal, khwaishein ...~~~

khwaab, khayaal, khwaishein
haseen lafz hain yeh bahut hi...

inki pehchaan jise ho jaaye
inse door nahi ja paata phir...

aashiq, aawaara, aatishan sab
dhoondhte phirte hain sabab,
in ajeeb-o-ghareeb ehsaason
ki teh tak jaa kar, zindagi ka...

uljhane suljhaane, mitaane ka,
zamaane ke ghamon ko fakat
bhool jaane ka, ek zariya hain,
khwaab, khayaal, khwaishein...

socho to kya kuch nahi dikha
sakte hain khwaab neend mein,
khwaishein jagati hain rooh ko,
khyaal zinda rakhte hain humein...

inki pehchaan jise ho jaaye
inse door nahi ja paata phir...

khwaab, khayaal, khwaishein
haseen lafz hain ye bahut hi...

Monday, February 27, 2012

'किस्मत'

उसकी नज़र का पीछा करो, ज़रा देखो...
बोझल सी, ओझल सी होती जाए कहाँ?
कमबख्त ठहरती ही नहीं, रुके तो कहीं!

तुम दिन की बात करते हो? नौसिखिये!
मैंने पल-पल इसे हदें पार करते देखा है!
कितनों ने सोचा, इसे रोक लेंगे, रख लेंगे...
रुकना इसका मिज़ाज़ कभी था ही नहीं ।

यह जाए जब इसे जाने दो, छोड़ दो इसे,
तुम्हारे रोकने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा ।
ग़ुरूर खुद पर ऐसा कभी रखना नहीं, 
तुम तो कुछ नहीं, कितने ही मारे गए ।

क्या कहा तुमने? तुम्हारा हक़ बनता है?
सब यही तो कहते हैं पहले-पहल यहाँ...
मैंने कई बसंत पतझड़ में बदलते देखे हैं,
खुद ही फैसला कर लेना जब देखोगे ।

हाँ, ठीक कहा, मैं तो बस लेखक भर हूँ,
सपनों और रोमांच की दुनिया मेरी है ।
आये लेकिन जहाँ से हैं, हम जायेंगे वहीँ...
ले जाने का काम इसी का होगा, समझे?

यह 'किस्मत' है, इतराती है, इठलाती है 
और हम...हम बस इशारों पर नाचते हैं ।

Wednesday, February 8, 2012

'Maahi'



गहरे अंधेरों में रौशनी का सुराग
बंजर बियाबानों में गुलज़ार खुशबू
सुनसान रास्तों में कदमों की आहट
रक़ीबों की महफ़िल में अपना कोई


लोगों की भीड़ में घिरे होने पर भी
हाथों में हाथ हो तुम्हारा अगर अब
तूफानों से टकराने की हिम्मत मिले
और डूबतों को मिल जाए किनारा


रूह-ए-'विती' तलाशती फिरती थी
अपना सा ही कोई और आधा-अधूरा
आज काएनात से लड़ते-लड़ते, 'माही'
पा ली है, तुम्हारे आगोश में पनाह!



Gehre andheron mein roshni ka suraag
Banjar biyabaanon mein gulzar khushbu
Sunsaan raaston mein kadmon ki aahat
Raqeebon ki mehfil mein apna koi


Logon ki bheed mein ghire hone par bhi
Haathon mein haath ho tumhaara agar ab
Toofaanon se takraane ki himmat mile
Aur doobton ko mil jaaye kinaara


Rooh-e-'Viti' talaashti phirti thi
Apna sa hi koi aur aadha-adhoora
Aaj kainaat se ladte-ladte, 'Maahi'
Paa li hai, tumhaare aagosh mein panaah!



I love you, Maahi!





Tuesday, January 24, 2012

'Soulmate'

'Soulmate' शब्द है अंग्रेजी में, सुना ही होगा सबने।
मुझे हंसी आती थी जब भी मैं सुनती थी...पर अब...
सोचने पर मजबूर कर देता है। यकीन होने लगा है!
कितना अजीब है ना?  मैं उसे देखते ही पहचान गयी।
मैं...या शायद मेरी रूह।  शायद पुराने दोस्त रहे होंगे...
हो सकता है इस ज़िन्दगी से पहले कभी? किसे पता?
शब्दों की ज़रुरत महसूस ही नहीं हुई फिर तो, दोनों ने 
यूँही दिल की बातें सुनना बेहतर समझा। अच्चा लगा।
अक्सर होता है, कहानियां सुनते हैं सभी मोहब्बत की।
मैंने भी सुने थे किस्से, देखा था लोगों को, और सोच
लिया था की, "बेटा, तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता!"
और फिर अचानक आई मेरे दर दस्तक 'माही' की...
दिल का खोना तो लाज़मी था, सो वोह ले गयी साथ।
कुछ खोता है तो हम ढूंढते हैं, पर मैं तो खुश थी बहुत!
आखिर मेरे हिस्से में उसका खूबसूरत दिल जो आया।
और सच कहूँ तो, उसका मिलना, उससे मोहब्बत...
नया नहीं था...हम पहले कहीं मिल चुके थे, पक्का!
याद तो नहीं, ना उसे, ना मुझे। हम सोचते भी नहीं।
'विती' खुशनसीब समझती है खुद को आज, 'माही,'
तुम्हारे बिना काफी हद तक आधी-अधूरी सी थी।

Saturday, December 10, 2011

Happy Birthday, Pallavi!

(People please help me out in wishing her!  Wish her in the comments section!  the more comments, the better it is! :) )

You have been my best friend and the best one I could ask for.  It has been an amazing 6 years and I hope there is a lot more to come.  You are one of the most amazing and interesting people I have ever met.  There is a lot I can say but I will summarize here:

jisne kavita ke ras ko pechaana hai
jiske aage jhukta yeh zamaana hai
jisme hai thehrav aur tezi, dono hi
jo itraati hai, par sharmaati bhi hai...


woh hai kaun batlao to?


jo milta hai uske hi gun gaata hai
nazrein uth jaayen, to sannata hai
jidhar jaaye wahan chhaa hi jaaye
jisse bhi bole, use bhaa woh jaaye...


arre ab batla bhi do?


ladki ghazab hai, kehte sab hain
uske gaanon mein ulajhte sab hain
duniya rukti hai, muskurati hai jab
aankhein kuch jhilmilaati hain tab...


woh hai...pallavi!!!

Sunday, December 4, 2011

Tangled...

The morning light tiptoes through the shut blinds.
It wakes me up and I just lay there tangled in you.
You breathe deeply as you sleep.  I keep looking.
So beautiful, the chemistry and the long nights too.
Interesting.  The world is so welcoming right now.

सुबह का उजाला खिड़की से धीरे-धीरे टपक रहा है
मैं जाग कर तुम्हारे साथ उलझी हुई लेटी हूँ अभी
तुम नींद में गहरी सांसें लेती हो, मैं देख रही हूँ
कितनी खूबसूरत है, यह रहगुज़र, और लम्बी रातें
क्या बात है?  दुनिया आज कुछ ज्यादा मेहरबान है?
आँखों से आँखें मिला लूं ज़रा, तुम जग जाओ अब तो
काम पर जाने से पहले तुम्हे थोडा और प्यार कर लूं
रात थके से थे, लिपट कर सो गए जाने कब, याद नहीं
कुछ बातें करनी थीं, बिना बोले, चलो अब कर लेते हैं
उँगलियों से बदन पर लिखती हूँ तुम्हारे, पढना तो...
तुम होठों की छुअन से बताना तुमने सुना या नहीं

Sunday, November 6, 2011

यादों से भरे हुए, सियाह पन्ने

यादों से भरे हुए, सियाह पन्ने पलटने का वक़्त था,
थोड़ा सोच कर कुछ उठाए और कुछ जला दिए |

फरवरी का दरवाज़ा एक खुला था उस कहानी में,
ज़िद कर के मैंने उसे सुनाने को किया था मजबूर |
जाने कहाँ से उठाई थी कहानी उसने एक अनकही,
शायद किसी किसान के बेटे से जिसे वोह पढ़ाती थी |
फसल की कटाई के बारे में थी कहानी, अजीब सी,
सुनाते-सुनाते जिसे वोह सो भी गयी थी, पर मैं नहीं |

कहानियां तो और भी बहुत सी सुनाई गयीं थी मुझे,
कभी इतना ध्यान मैंने दिया नहीं, ख़ास लगीं नहीं |

दूसरी एक कहानी मैंने ही बनायी थी किसी के साथ,
नदिया के पार जाने की जुस्तजू वाली एक कहानी |
श्याम काका का तांगा, नीम के पेड़ के नीचे चबूतरा,
तरबूज़ की फांकों के पैसे देने के लिए लड़ना-झगड़ना |
मेरे लिए पेड़ से आम कोई तोड़ रहा था, गा रहा था |
अब वोह दूसरा ज़माना लगता है, और वोह परायी |

तीसरी कहानी लिखी जा रही है, रास आ रही है |
बातों ही बातों में बनती गयी, चलती गयी इस बार |

मुझे थामे हैं बाहें और मेरी ख्वाहिशें हो रही हैं पूरी,
ज़रुरत भी नहीं रहती कभी-कभी कुछ भी कहने की |
आँखों से दास्तानें कई बनती जाती हैं हर दिन अब,
जो बचता है वोह लब सुन लेते हैं लबों से चुप्पी में |
आवाज़ कानों में शहद घोलती हुई मुझे छेड़ती है,
मैं माज़ी से दूर, नयी कहानी की एक किरदार हूँ |

कहीं टकरा गया अतीत मेरा राहों में अब तो क्या?
नए-पुराने लोग, एक नोवेल का शायद हिस्सा हैं |

Tuesday, November 1, 2011

एक आग़ाज़

*'वितस्ता' कश्मीर में बहने वाली झेलम नदी का एक नाम है |*


कभी कभी मन में आता है की काग़ज़ पर पूरी ज़िन्दगी उतार दूं अपनी
बिना किसी परवाह के, बिना कुछ सोचे समझे, बस निकाल दूँ सब कुछ 
अपने मन से, इस तरह कि कुछ ना बचे और एक नयी शुरुआत हो मेरी...
जैसे एक नया जनम, एक नयी ज़िन्दगी, एक आग़ाज़, 'वितस्ता' का |

जिस नदी के नाम से मुझे मिली है पहचान
उसकी ही तरह बह चलूँ मैं किसी दिन तो,
हदों से दूर, ज़माने के दस्तूरों को तोड़ कर 
वादियों कि परछाई में, ग़मों को छोड़ कर |

कोशिश बहुत रही कि सीमाओं में रह लूं,
डाल कर, अपने बावरेपन को पिंजरों में,
ध्यान लगाऊं रोज़मर्रा कि ज़िन्दगी में बस |
पर रूह मरने लगे जब, तो क्या करे कोई?

चाहत खुली हवा कि जिसे, और उड़ानों की,
लाख़ चाहे भी तो नहीं कर सकता समझौते |
परवानों को शमा की दीवानगी जैसे होगी,
मुझे भी है जूनून बेलगाम आज़ादियों का !

समझा मैं सकी नहीं यह बातें जिन्हें कभी
वोह खुश हैं, अपने किस्सों में सब गुम हैं |
मैं एक कहानी भर हूँ उनके लिए, दूर हूँ,
'बावरी,' अपनी धुन में खोयी, सोयी सी |

अब जब मुझे समझा किसी ने तो जागे हैं,
थोडा सकपकाए भी हैं यह पुराने दोस्त |
मेरा माझी, मेरा 'माही' अब जो है पास,
पा लूंगी अपनी आज़ादियाँ मैं, जल्द ही !


Monday, October 24, 2011

क्या करे 'बावरी'?

कमी सी है कुछ आज धूप में...
रौशनी फैली तो है सभी जगह,
जाने क्यूँ मुझे अँधेरा दिखता है ?  
आज आसमान रोता सा लगे है |

सुकून दुनिया भर का क्यूँ फकत
उस की बाहों में समाया है, बोलो?

अब जब वोह करीब हो कर भी 
पास नहीं मेरे, तो करूँ क्या मैं?
सपनों में मिल तो लूं, लेकिन...
नींद कमबख्त उसके जाने के 
बाद से ही लापता हो गयी!

दिमाग में एक अटके से record 
की तरह साथ बिताए पल बस
बार-बार घूमते ही जा रहे हैं,
मुझे तडपाये जा रहे हैं, रोज़ |

ऐसे मंज़र में क्या करे 'बावरी'?
बस और पागल हुए जा रही है |


Saturday, October 8, 2011

~~~...बेफिक्र...~~~

जब मेरी बाहों से घिरी हुई,
मेरे काँधे पर रख कर सर
सोती है वोह तो लगता है 
सारी कायनात थम जाए |
रुक जाए बस वहीँ, उसी
इक लम्हे में कैद हो जाएँ,
ज़िन्दगी गुज़ार दें, बेफिक्र |