Sunday, March 20, 2011

~~~...गुलदस्ते भी रख छोड़े थे...~~~

चंद सीढियां क्या बना दी अपने घर तक पहुँचने को,
कोई अब ऊपर आना ही नहीं चाहता मिलने मुझसे |
खुद बैठे हैं बहुमंजिला इमारतों में झांकते हुए कबसे, 
अब कोई मिलने आएगा, तब कोई मिलने आएगा |
उनके लिए न केवल ऊँचाइयाँ लांघी थी मैंने, बल्कि
फूलों से भरे गुलदस्ते भी रख छोड़े थे दरवाजों पर |

'विती,' बस एक ही काम अब कभी ना करना तुम,
कभी 'नूर' से भी, वर्जिश की उम्मीद ना रखना तुम |

5 comments:

  1. great lines. to compare you with Gulzar won't be incorrect. keep at it. hone this pain slowly on the fire of longing till it's flame rises and lights up the sky. amen

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  2. naice noor varjish kare na kare hum zaroor mehnat kar ke aapko padhte rahenge :D

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  3. Intezaar karna us ek ki ... jo seedi chadne ki himmat rakhe...
    Har koi itna kaabil nahin ki... Sar utha ke apne kismat to dekhe

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