Saturday, December 10, 2011

Happy Birthday, Pallavi!

(People please help me out in wishing her!  Wish her in the comments section!  the more comments, the better it is! :) )

You have been my best friend and the best one I could ask for.  It has been an amazing 6 years and I hope there is a lot more to come.  You are one of the most amazing and interesting people I have ever met.  There is a lot I can say but I will summarize here:

jisne kavita ke ras ko pechaana hai
jiske aage jhukta yeh zamaana hai
jisme hai thehrav aur tezi, dono hi
jo itraati hai, par sharmaati bhi hai...


woh hai kaun batlao to?


jo milta hai uske hi gun gaata hai
nazrein uth jaayen, to sannata hai
jidhar jaaye wahan chhaa hi jaaye
jisse bhi bole, use bhaa woh jaaye...


arre ab batla bhi do?


ladki ghazab hai, kehte sab hain
uske gaanon mein ulajhte sab hain
duniya rukti hai, muskurati hai jab
aankhein kuch jhilmilaati hain tab...


woh hai...pallavi!!!

Sunday, December 4, 2011

Tangled...

The morning light tiptoes through the shut blinds.
It wakes me up and I just lay there tangled in you.
You breathe deeply as you sleep.  I keep looking.
So beautiful, the chemistry and the long nights too.
Interesting.  The world is so welcoming right now.

सुबह का उजाला खिड़की से धीरे-धीरे टपक रहा है
मैं जाग कर तुम्हारे साथ उलझी हुई लेटी हूँ अभी
तुम नींद में गहरी सांसें लेती हो, मैं देख रही हूँ
कितनी खूबसूरत है, यह रहगुज़र, और लम्बी रातें
क्या बात है?  दुनिया आज कुछ ज्यादा मेहरबान है?
आँखों से आँखें मिला लूं ज़रा, तुम जग जाओ अब तो
काम पर जाने से पहले तुम्हे थोडा और प्यार कर लूं
रात थके से थे, लिपट कर सो गए जाने कब, याद नहीं
कुछ बातें करनी थीं, बिना बोले, चलो अब कर लेते हैं
उँगलियों से बदन पर लिखती हूँ तुम्हारे, पढना तो...
तुम होठों की छुअन से बताना तुमने सुना या नहीं

Sunday, November 6, 2011

यादों से भरे हुए, सियाह पन्ने

यादों से भरे हुए, सियाह पन्ने पलटने का वक़्त था,
थोड़ा सोच कर कुछ उठाए और कुछ जला दिए |

फरवरी का दरवाज़ा एक खुला था उस कहानी में,
ज़िद कर के मैंने उसे सुनाने को किया था मजबूर |
जाने कहाँ से उठाई थी कहानी उसने एक अनकही,
शायद किसी किसान के बेटे से जिसे वोह पढ़ाती थी |
फसल की कटाई के बारे में थी कहानी, अजीब सी,
सुनाते-सुनाते जिसे वोह सो भी गयी थी, पर मैं नहीं |

कहानियां तो और भी बहुत सी सुनाई गयीं थी मुझे,
कभी इतना ध्यान मैंने दिया नहीं, ख़ास लगीं नहीं |

दूसरी एक कहानी मैंने ही बनायी थी किसी के साथ,
नदिया के पार जाने की जुस्तजू वाली एक कहानी |
श्याम काका का तांगा, नीम के पेड़ के नीचे चबूतरा,
तरबूज़ की फांकों के पैसे देने के लिए लड़ना-झगड़ना |
मेरे लिए पेड़ से आम कोई तोड़ रहा था, गा रहा था |
अब वोह दूसरा ज़माना लगता है, और वोह परायी |

तीसरी कहानी लिखी जा रही है, रास आ रही है |
बातों ही बातों में बनती गयी, चलती गयी इस बार |

मुझे थामे हैं बाहें और मेरी ख्वाहिशें हो रही हैं पूरी,
ज़रुरत भी नहीं रहती कभी-कभी कुछ भी कहने की |
आँखों से दास्तानें कई बनती जाती हैं हर दिन अब,
जो बचता है वोह लब सुन लेते हैं लबों से चुप्पी में |
आवाज़ कानों में शहद घोलती हुई मुझे छेड़ती है,
मैं माज़ी से दूर, नयी कहानी की एक किरदार हूँ |

कहीं टकरा गया अतीत मेरा राहों में अब तो क्या?
नए-पुराने लोग, एक नोवेल का शायद हिस्सा हैं |

Tuesday, November 1, 2011

एक आग़ाज़

*'वितस्ता' कश्मीर में बहने वाली झेलम नदी का एक नाम है |*


कभी कभी मन में आता है की काग़ज़ पर पूरी ज़िन्दगी उतार दूं अपनी
बिना किसी परवाह के, बिना कुछ सोचे समझे, बस निकाल दूँ सब कुछ 
अपने मन से, इस तरह कि कुछ ना बचे और एक नयी शुरुआत हो मेरी...
जैसे एक नया जनम, एक नयी ज़िन्दगी, एक आग़ाज़, 'वितस्ता' का |

जिस नदी के नाम से मुझे मिली है पहचान
उसकी ही तरह बह चलूँ मैं किसी दिन तो,
हदों से दूर, ज़माने के दस्तूरों को तोड़ कर 
वादियों कि परछाई में, ग़मों को छोड़ कर |

कोशिश बहुत रही कि सीमाओं में रह लूं,
डाल कर, अपने बावरेपन को पिंजरों में,
ध्यान लगाऊं रोज़मर्रा कि ज़िन्दगी में बस |
पर रूह मरने लगे जब, तो क्या करे कोई?

चाहत खुली हवा कि जिसे, और उड़ानों की,
लाख़ चाहे भी तो नहीं कर सकता समझौते |
परवानों को शमा की दीवानगी जैसे होगी,
मुझे भी है जूनून बेलगाम आज़ादियों का !

समझा मैं सकी नहीं यह बातें जिन्हें कभी
वोह खुश हैं, अपने किस्सों में सब गुम हैं |
मैं एक कहानी भर हूँ उनके लिए, दूर हूँ,
'बावरी,' अपनी धुन में खोयी, सोयी सी |

अब जब मुझे समझा किसी ने तो जागे हैं,
थोडा सकपकाए भी हैं यह पुराने दोस्त |
मेरा माझी, मेरा 'माही' अब जो है पास,
पा लूंगी अपनी आज़ादियाँ मैं, जल्द ही !


Monday, October 24, 2011

क्या करे 'बावरी'?

कमी सी है कुछ आज धूप में...
रौशनी फैली तो है सभी जगह,
जाने क्यूँ मुझे अँधेरा दिखता है ?  
आज आसमान रोता सा लगे है |

सुकून दुनिया भर का क्यूँ फकत
उस की बाहों में समाया है, बोलो?

अब जब वोह करीब हो कर भी 
पास नहीं मेरे, तो करूँ क्या मैं?
सपनों में मिल तो लूं, लेकिन...
नींद कमबख्त उसके जाने के 
बाद से ही लापता हो गयी!

दिमाग में एक अटके से record 
की तरह साथ बिताए पल बस
बार-बार घूमते ही जा रहे हैं,
मुझे तडपाये जा रहे हैं, रोज़ |

ऐसे मंज़र में क्या करे 'बावरी'?
बस और पागल हुए जा रही है |


Saturday, October 8, 2011

~~~...बेफिक्र...~~~

जब मेरी बाहों से घिरी हुई,
मेरे काँधे पर रख कर सर
सोती है वोह तो लगता है 
सारी कायनात थम जाए |
रुक जाए बस वहीँ, उसी
इक लम्हे में कैद हो जाएँ,
ज़िन्दगी गुज़ार दें, बेफिक्र |

Thursday, September 29, 2011

~~~...flat के दाम...~~~



किस रास्ते के किस मोड़ पर छोडोगी
इसका भी हिसाब दे देती जब notice दिया था
दिल खाली करने का
मैंने तो दो दिन ही काटे थे
शायद कोठी को गिरा कर, बहुमंजिला इमारत
बनाई जाएगी जल्द ही
मुझे flat के दाम ज़रूर बता देना

सोचना कुछ, समझना कुछ, बोलना कुछ और...



[disclaimer: in case you will be worried, and will start asking me questions... i wrote this in a rage induced creativity spike, it has nothing to do with anything in my life :) ]

Sunday, August 14, 2011

Musings

Originally posted as tweets with the hashtag #musings.

  • जुल्फों से घिरी तेरे माथे की शिकन भी नज़र में आती हैं तो ग़ज़ब का सुकून देती हैं |
  • चलो निकल चलते हैं सफ़र पर, कभी राह तुम्हारी होगी, तो कभी कदम मेरे |
  • सूखी कलम को बस एक ज़ुल्फ़ की बदली चाहिए. सरपट फिर जो दौड़ती है, देखने लायक चीज़ है |
  • दीवानों सी हालत में मुंह खुलवाया न करो, 'नूर' को खुदा कहना कुछ अच्चा सा तब लगता है |
  • तुम भले ही सो जाओ, नींद मुझे कब आएगी?  तुम्हारी मेरी उलझी साँसों से निकलने में ही सुबह हो जायेगी |
  • ट्रेन की आवाज़ रात के सन्नाटे में जब कानों तक आती है, एक टीस सी उठती है |
  • शायरी न समझो तो कोई ग़म नहीं, कम से कम इश्क का दर्जा उसे हवस बुला कर कम तो मत करो | 
  • अकेले तो बहुत सी राहें गुज़र गयीं, यूँ फ़कत दो कदम साथ चल कर मेरी आदत ना बिगाड़ो |
  • और कितने दफे मेरे हाथ को ले कर हाथ में, छोड़ने का इरादा है?  अब किसी और का थाम लो, कुछ चैन मिले शायद |
  • सावन का पानी तो बुझाने से ज्यादा झुलसाने पर तुला हुआ है, प्यास और कमबख्त 'नूर' ने जगा रखी है |
  • जान कर अनजान, दिल भी दो दिन का मेहमान, कम से कम दो दिन तो अपने हुस्न की बारिश का मज़ा ले लेने दो!
  • वोह पास आकर कान में खुस्फुसाना तुम्हारा इन बादलों की गडगडाहट से कुछ कम नहीं है |
  • मेरी आँखों से काजल उस रात कुछ ऐसे ही बहा था, जैसे आज रात का अँधेरा बिजली के कौंधने पर बह रहा है |
  • गूंजते बादल कुछ कहानियां सुना रहे हैं आज, शायद इन्हें भी तेरे खुले गेसुओं की झलक मिल गयी है |

Thursday, June 16, 2011

:)

Door rehkar itna sataya na karo
Din mein khwaab dikhaya na karo
Mere zehan mein is kadar basi ho
Judai ke khayaal se daraya na karo
Inteha se aage ja chuki hai chaahat
Mohabbat ke naye andaaz sikhaya na karo
Pighal ke kabhi dil gir jayega zamin par
Meri baaton se yun sharmaya na karo
Ki nahi rehta kaabu ab dil par
Apni haalat mujhe bataya na karo
Waqt-bewaqt khumaari ka aalam
Aisi baatein 'Viti' se bulwaya na karo...

Monday, June 13, 2011

~~~...the rains...~~~

sunehri shaam, sunehra badan,
baadalon mein zulfon ki badliyan...
shayar ko is mausam ne kahin ka nahin chhoda!

******

nazm tumhaari zulfon mein kuch ulajh si gayi hai,
guftagu se lagta hai lekin qayenaat kuch sulajh si gayi hai...

******

monsoon ki pehli baarish mein bheegna,
kuch sulag jao to phir mujhe yaad karna...
pata hai?  woh baadal maine hi bheja tha.

Saturday, May 14, 2011

~~~...Guftagu...~~~

बावरी: "और तुम धीरे से जब पलकें उठाओगी ना, उस दम
दूर ठहरे हुए पानी पे सहर खोलेगी आँखें
सुबह हो जाएगी तब, ज़मीन पर" - गुलज़ार

यह तुम्हारे लिए था, और मेरे लिए.. 
"अपनी ही साँसों का कैदी
रेशम का यह शायर इक दिन
अपने ही तागों में घुटकर मर जायेगा" - गुलज़ार


नूर: ..इक बार कुछ यूँ हुआ..आँख खुली, सपना टूटा और सामने तुम थी...
क्या वोह सपना सच में टूटा था? 

बावरी: टूटा भी हो तो क्या?  
टुकड़े जोड़ कर तसवीरें बनाना शौक़ रहा है बचपन से...
मेरे साथ खेलोगी?

नूर: हाँ, याद है मुझे जब तुमने कहा था, गुट्टे खेलोगी? उछालेंगे दिल साथ, देखते हैं पकड़ पाती हो कि नहीं..
तब से मेरा यह शौक हो गया..तुम खेलोगी?

बावरी: दिल उछालने का खेल मैंने ही सिखा दिया तुम्हे? 
खैर शौक़ तो शौक़ ही है..
सुनो, दिल पकड़ में आये जो, 
वापस तो नहीं मांग लोगी ना?

नूर: वापस क्यूँ मांगूंगी.. 
दिल दे के तो देखो, जीत जाउंगी!

बावरी: जीत गयी हो, 
दिल छुपा है जेब में, 
उस ख़त की तरह |

नूर: वोह ख़त? पता है, पान की डिबिया में छुपा रखा है मैंने..
तुम कब आओगी? सुपारी सूखने लगी है

बावरी: सावन की पहली झड़ी के साथ देखना मेरे आने की सदा भी होगी..
तुम तैयार रखना सामान, तुम्हे साथ लेकर जाउंगी!

Tuesday, May 3, 2011

Unfinished thoughts

Unfinished thoughts, always disrupting
The systematic beats of life's soundtrack.

जुबां पर शिकायतों की रंगीनियाँ सजा दीं आपने,
दिल को क्यूँ कोरा सा छोड़ दिया, बेरंग इस कदर?
खूबसूरती में कभी प्यार के मीठे बोल भी घोलना,
कसम रूह अफ़ज़ा की, चार चाँद ना लग जाएँ जो!
आदत हो चली है सब सुनकर अनसुना कर देने की,
गलती आपकी नहीं, मुझे तो लगता है कानों की है!
कुछ हद तक मेरे लफ़्ज़ों ने साथ दिया तो है मेरा,
आपके चेहरे की इक मुस्कान मिलती ही रहती है |
फिर कभी गलती से आप कुछ पूछ लेती हैं मुझसे,
"ऐसा क्यूँ लिखा? क्या मतलब है इसका, 'विती'?"
दर-ओ-दीवार की नज़ाकत मैं तो समझाने से रही,
जिस दिन खड़े हों या गिर जाएँ, समझ लेंगी 'नूर' |

Life's soundtrack with its systematic beats.
Always disrupted by unfinished thoughts.

Monday, April 25, 2011

blah

मैंने जब जवाब मांगे तो सवाल थमा दिए,
मंजिलें तय करीं तो सारे रास्ते हटा दिए |

सोचा उलझनों पर सवार ही चलते हैं अब,
ख़्वाबों के पहियों के आगे कांटे फैला दिए |

दुश्मनी जाने कौन सी खुद से निकालनी है,
आबरू को सर-ए-राह दो चांटे लगा दिए |

मुश्किल से जो दो-एक दोस्त इक्कठा किये,
बेदर्दी से तब उनके घरों पे ताले लगा दिए |

ग़ैर ने हालात थमाए होते तो कुछ बात थी,
'विती' तुमने यह नज़ारे खुद ही सजा दिए |

Wednesday, April 20, 2011

This is where it ends, and begins



The kohl lined eyes of the angel
Look for all the little dreams lost.
Troubled, squinting & searching,
Lost in a dreary, unending maze.


मेरी नज़रें थकेंगी नहीं, गर ऐसा सोचा हो तुमने |
किनारे से मिलने का सपना लेकर चली है लहर,
फ़ना होना पसंद करेगी, साहिल बन जाना नहीं |



The world stops to listen in now.
Leaving it all behind, who knew,
Everything will find its way back?

दर-ओ-दीवारें बनाते देर कहाँ लगती है, जनाब?
लोगों को इनकी नज़ाकत समझाते वक़्त लगता है |



This is where it ends, and begins.





Wednesday, April 13, 2011

~~~...बस की नहीं...~~~

पोशाक पर पोशाक, परत पर परत चढ़ी हुई हैं;
तेरे दिल तक पहुंचना बस की नहीं, दूर है बहुत |



किताब हो तुम जिसके पन्ने पलटते उम्र गुज़री है,
अभी तो आधे रास्ते तक भी नहीं पहुँच पायी हूँ |

पुरानी किताबों में खुशबुयें सी होती हैं वक़्त की,
पुराने पत्ते, फूल भी कभी; मुझे कुछ नहीं मिला |

कहने को बाहों में थामा जाने कितनी बार, पर,
चमकती आँखों के राज़ अभी तलक लापता से हैं |

काग़ज़ों के पुर्जों में छुपाया है सारे वादों को मैंने,
खुद को पढ़वाती रहती हूँ, ताकि यकीं बना रहे |


आजकल 'नूर' की मांग शायद ग्राहकों में बढ़ी है,
'विती' हक़ रखती ज़रूर है, मगर जताती नहीं |

Friday, April 8, 2011

The Many Muses of Insanity [Part 1]

The plane sped on the runway, about to take off.  Buckled in and sitting at a window seat, I realized my mind kept wandering back to everything that had happened in the last month.  Crazy was the only word to describe it.  I shook my head, hoping that the action would disrupt the thoughts and maybe I could finally catch some sleep.  I closed my eyes, and of course, a baby started crying in the plane as soon as the wheels left the ground and we rose up into the air.  Mental note: try not to travel via air when my kid is still an infant, if I ever become a mother.  There was no way I was going to get any sleep.  I suppose thinking about all the madness might actually be a good thing.  Once again, I shut my eyes and tried to produce a chronological collection of memories.

The insanity began when I made my way to my hometown, Nagzabad, after an absence of nearly 3 years.  The year was 2010 then, a month ago in December.   

My journey's first step was flying into Delhi, and I had kept a week aside for exploring the city.  There is a certain charm that Delhi has held for me, always, ever since I can remember.  Old Delhi, mind you.  Oh, and Qutub Minar.  Somehow that one monument has become a symbol of the things that matter a lot to me but I seldom mention.  The structure looms in the time-tarnished corners of my mind, but it is very much there, and it emerges subconsciously in dreams whenever I let go of the control that rules my waking hours.

The Qutub should have been the ideal place for a day out with old friends.  Instead it turned into the stage for a bizarre sequence of events.

Barely audible notifications sounded just then, for wearing the seatbelt was no longer necessary.  I was forced to open my eyes with the bustle of people moving about.  Dinner to be served soon, the attendant announced.  The story would have to wait until I finish eating.  Creativity of this sort, I have realized, has the potential to build up a huge appetite.

Tuesday, March 29, 2011

Bleeding Blue!

छुट्टी ली है आज ऑफिस से मिन्नतें कर,
लेकिन देखो जान, बुरा ना मान जाना!
तुम्हारी खातिर सारे दिन-ओ-रात मेरे,
लेकिन यह शाम तो क्रिकेट को कुरबां!
बल्कि सुनो, आओगी मैच देखने तो मैं
शौपिंग करने कल ही चलूँगा जहाँ कहो!
एक दिन तुम भी तो देखो कि दीवानगी
क्या चीज़ है | नीले रंग में होगी दुनिया |
मोहाली का माहौल गरमाया सा होगा,
ठंड होती शायद हाथ भी सेंक लेते, खैर!
हिंदुस्तान-पाकिस्तान भिड़ रहें हैं आखिर,
कोई कैसे इस मैच को मिस कर सकता है?
और तो और उड़ती-उड़ती सी खबर मिली,
हम जीते तो 'पूनम' का चाँद भी चमकेगा!

Saturday, March 26, 2011

~~~...अब बहने दो...~~~

My mind is coming apart;
At the seams, lies undone.

सिलाई खुलती सी गयी, मैंने भी सिरा खींचा ,
फिर कुछ देर हुई, उखाड़ा पेड़ जिसे था सींचा |

The endless white wall &
My head collide. Thump.

आज दिमाग जवाब दे गया, कुछ देर के लिए |
होश सच में मुझे छोड़ गया, कुछ देर के लिए |

Here cries the pain. Look,
There's the rain.  Go, run.

बारिश में मिला कुछ पल का सुकून रहने दो ,
बहुत रोका तुमने इस नदी को, अब बहने दो |

My mind is coming apart;
At the seams, lies undone.

Sunday, March 20, 2011

~~~...गुलदस्ते भी रख छोड़े थे...~~~

चंद सीढियां क्या बना दी अपने घर तक पहुँचने को,
कोई अब ऊपर आना ही नहीं चाहता मिलने मुझसे |
खुद बैठे हैं बहुमंजिला इमारतों में झांकते हुए कबसे, 
अब कोई मिलने आएगा, तब कोई मिलने आएगा |
उनके लिए न केवल ऊँचाइयाँ लांघी थी मैंने, बल्कि
फूलों से भरे गुलदस्ते भी रख छोड़े थे दरवाजों पर |

'विती,' बस एक ही काम अब कभी ना करना तुम,
कभी 'नूर' से भी, वर्जिश की उम्मीद ना रखना तुम |

Saturday, March 5, 2011

~~~...अब अलविदा...~~~

Me :
...lines from it:
उसे फिर लौट कर जाना है यह मालूम था उस वक़्त भी,
जब शाम की सुर्ख-ओ-सुनहरी रेत पर वो दौड़ती आई थी...
और लहराके यूँ आगोश में बिखरी थी,
जैसे पूरे का पूरा समुन्दर लेके उमड़ी हो...
-गुलज़ार

can you add to it?
as in मालूम था ... मगर?
अब क्या?

...


ठिठुरती सी शाम में कहाँ वो जाती और कहाँ मुझे अकेले आता चैन...

कॉफ़ी के बहाने उसे थोड़ी देर रोका,
'थोड़ी देर' रात भर में तब्दील हुई,
'रात भर' से चार दिन हो चले फिर |

'चार दिन' न हुए, जैसे किसी ने Wells की टाइम मशीन थमा दी हो...

उसका गुज़रा, मेरा आने वाला कल;
बीच की रहगुज़र उभरने सी लगी...
केवल हम दोनों के ज़हन ही में |

एक रात और तीन मुलाकातें | दोनों को आने वाली दूरी की खबर थी...

मैं किताबें, सपने, रोमांच ढूंढती थी,
तो वो शायद मनोरंजन का ज़रिया...
लोग हमें शक की निगाह से देखते थे |

'नूर' की आवाज़ पर फ़िदा 'विती' | उसे मेरी सादगी से बहुत लगाव था...

गुलाबों का, कुछ गानों का, शौक था,
नज़रों का उसकी असर कुछ शोख था...
उन्हीं आँखों से रात कईं अश्क बहे थे |

सालों हो जाते हैं खोजते, जो चार दिन में हम जी गए | अब अलविदा |

Monday, February 28, 2011

Abstract

एक रात के चाँद से जाने कितनी बातें करीं थीं;
बचपन से बुढ़ापे तक के सारे सपने और बंदिशें |

बहाना बना कर अगली रात खोली जो खिड़की,
नया चाँद मुझे गौर से ताकने लगा, हँसता हुआ |

चेहरे से झलकती उलझन देख दया आई शायद,
बोला "कल का ही हूँ मैं चाँद 'विती,' दोस्त तेरा!"

सब किस्से एक सांस में सुना गया वापस मुझे वो |
बोला, "लोग ज़िन्दगी में यूँ ही मिलेंगे आगे भी!"

थोडा भरा-भरा सा लग रहा था पिछले दिन से,
"बदलाव तो आने ही हैं, हिसाब रखना अब से!"

तब से आज तक जाने कितने ही लोग आये-गए,
चाँद से भी मेल-मिलाप नहीं होता | हाँ, 'नूर' है |

एक डायरी में लेखा-जोखा है सारे परिवर्तन का
कल उसे जला कर एक नयी ज़िन्दगी शुरू होगी |

Tuesday, February 15, 2011

:)



agar yun lage ki kisi ne pukaara naam tumhara
aur aas paas koi na dikhe door door tak...
samajh lena bas ki baavri si pawan ke sang
'noor' ko ek paigaam 'viti' ne bheja hai...




aadatan meri jaan dheere dheere jaati rahi
tere hoothon se muskurahat khilkhilati rahi

jannat ki aas ek baar phir ho chali darkinar
jab yunhi nazar se nazar meri takraati rahi

baahon mein thaama tha tumko, darte hue
door hone mein hai der, khudko behlati rahi

jab tak sitaara hai buland, kya hai fikr 'viti'
yeh baat main khudko tab samjhaati rahi

kal raat ajeeb sa ho raha tha mann, sehma
bas teri yaad hi phir raat bhar sehlaati rahi

'noor,' khushbu jo der se pehchani thi maine
subah talak mere zehan ko mehkaati rahi...







aadatan meri jaan dheere dheere jaati rahi
tere hoothon se muskurahat khilkhilati rahi


Wednesday, February 9, 2011

Valentine

Jahan itne Valentine nikal gaye,
Wahan ek aur jod do
Mathematical Induction lagao,
Aur aagey ki umeed bhi chod do..

(Thanks Viti, for this space :) )

Monday, February 7, 2011

~~~...जो हो चली 'विती' बावरी...~~~


दो एक बात कर लूँ फिर दिल लगाने की,
या लिख दूँ दास्ताँ तुमको भूल जाने की,
कर लूँ हज़ार वादे, सारे मैं निभा भी लूँ,
या सदा दूँ ए साक़ी शब को बहकाने की?

इन नज़रों के हसीन मयकदे की करूं बात,
नहीं तो लगाऊं शतरंज की नयी बिसात,
मांग लूँ तुमसे हक़ अपना एक आखरी बार,
नहीं तो पूछूँ की मेरी क्या रही औकात?

ख्वाइश है वहीँ पुरानी, हो हाथों में हाथ,
मिल जाए मुझे फिर से वोह इक रात,
जो हो चली 'विती' बावरी, और बेबाक,
'नूर,' ज़रा गौर से समझो यह हालात...

Wednesday, January 19, 2011

~~~... कुछ तो छोड़ दो 'नूर' ...~~~

For old time's sake and for a beautiful soul, a break from a break. :)

कुछ तो छोड़ दो 'नूर' इस जहां में जो तुम्हारी याद ना दिलाये...


सुबह चलूँ जाड़े में घर से तो कोहरा बन घेर लिया,
ऐसे ना चला काम तो ओस की बूँद बन चमक उठीं |
कभी यूँ ही गुलाब की पंखुड़ी में समा हाथ में आयीं
तो किसी दिन देखा की हवा को दे दी अपनी खुशबू |
अज़ान की बात क्या, मुझे रोज़ देती हो तुम सुनाई,
और अक्सर होता है, चूड़ियों में तुम ही खनकती हो |
हाल ही में पतंगों संग उड़ते-मचलते देखा था तुमको,
सागर की लहरें और झील का ठहराव, तुम ही तुम |


कुछ तो छोड़ दो 'नूर' इस जहां में जो तुम्हारी याद ना दिलाये...