Saturday, November 27, 2010

~~~...बेतरतीब अफसाना...~~~

शमा पर है इलज़ाम-ऐ-क़त्ल गर मारा जाए परवाना
कोसते सब मगर पिघली लौ के दर्द से हर कोई बेगाना

उसमें शोखी है, अदा है, घुरूर है, और ज़रा फ़िक्र भी,
उसे भी आता है पसंद यह अजीब, बेतरतीब अफसाना

वीरान दिल को आबाद तो करने से रही नज़र-ऐ-रहम
हाँ, साक़ी बन सको गर, ना जाना पड़े कभी मयखाना

निगाह पड़ जाए एक सरसरी, समझो बंदा तो दीवाना
खुदा, यहाँ शेर और बकरी के बीच कैसा है याराना?

खैरियत होती, तो दास्ताँ ना लिखी जाती मुझसे कोई
उसको दुआओं में ऊपर रखने का बस देना है हरजाना

कल गेसुओं को खुला छोड़ा तो 'नूर' ने कहा, "देखो!"
'विती,' क्या मजाल की मना करें जब है ऐसा बहाना?

7 comments:

  1. शमा जब जलाती है काग़ज़ के टुकड़ों को
    जहां में नूर पिघल जाता है

    शमा के उन इरादों को तो बस
    परवाना ही समझ पाता है

    पर शमा के जलने में अगर इतना नूर है
    सोचता हूँ मैं कभी

    तो 'शमा' जब खुद बयान कर दे अपने इरादे काग़ज़ पर
    तो क्या समां होता है, 'विती', तुम्हारे लफ़्ज़ों में नज़र आता है...

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  2. @AJ: uff! loved it...really loved it. curious as to who you are!

    thanks everyone! :)

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  3. Well... I loved yours more... Its one of those which intimidate me to write... Really Mesmerizing...

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